किसी युग की हिमाचल नगरी रहा है माचलपुर ,यहाँ हुए थे भगवान शिव और माता पार्वती के सात फेरे
- Written by NAGESH KUMAR JOSHI
माचलपुर : - नगर को इतिहास की दृष्टि से देखे या पीढ़ियों से चली आरही कहानियों या दंत कथाओ से देखे नगर में आज भी हिमाचल नगरी जो माता पार्वती का मायका कहा जाता है वो सारे तथ्य माचलपुर नगर में आज भी विद्यमान है ऐसा माना जाता है कि किसी युग मे माचलपुर नगर माता पार्वती की नगरी हुआ करता था याने माँ पार्वती का मायका हुआ करता था किसी युग मे यहा माता पार्वती ओर भगवान शंकर का विवाह हुआ था । जिसके प्रमाण आज भी यहाँ देखने को मिलते है ।कहा जाता है कि यह नगरी काफी प्राचीन नगरी है जिसे पहले के युगों में हिमाचल नाम से ही जाना जाता था अब वर्तमान में इस नगरी का नाम माचलपुर है ।प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर होने का कोई एक प्रमाण नही है इस नगर में अनेक ऐसे स्थान है जो इस नगर के प्राचीन होने एवं शिव-पार्वती विवाह संपन्न होने के अनेकों प्रमाण देते है , यह नगर पूर्णरूप से धार्मिक नगरी के नाम से जाना जाने वाला नगर है जिसको माँ पार्वती का नगर भी कहते है ,माचलपुर के चारो ओर प्राचीन मंदिर ,इमारते,स्तूप,बावड़िया,तालाब, आदि है जिनके बीचो बीच नगर बसा हुआ है ,नगर में प्रवेश करने से पहले ही ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे यह नगर वर्तमान का न होकर अत्यधिक प्राचीन नगर है ,इसी कारण इसे प्राचीन नगरी माता पार्वती का मायका कहा जाता है l
शिव पार्वती के विवाह का सबसे बड़ा प्रमाण यह है
1. सात फेरे (बाघा बल्डी)
नगर से कुछ ही दूरी पर कचनारिया रोड़ पर बाघा बल्डी है जहाँ माता पार्वती ओर भगवान शिव का विवाह कीसी युग मे सम्पन्न हुआ था , यहा पर आज भी साथ फेरे बने हुवे है और साथ फेरो के बीच मे भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्तियां विराजमान है ,आज भी लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इन साथ फेरो मे नंगे पैर चक्कर लगाते है ऐसा मानना है कि यहाँ नंगे पांव सात फेरों में चलकर शिव पार्वती के दर्शन करने से मनकामना सिद्ध होती है ,बाघा बल्डी के एक सिरे पर भगवान महादेव का भव्य मंदिर बना हुआ है जिसे बाघेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है ,बाघा बल्डी पर कई लोग पिकनिक करने भी आते है ,यहाँ हर शिव रात्रि को ओर सावन के सोमवार को मेले जैसा लगता है ,यहा हजारो की संख्या में लोग साथ फेरो एवं मंदिर में दर्शन करने आते है ,पूरी रात्रि श्रद्धालुओ द्वारा भक्ति भाव ,भजन कीर्तन आदि किया जाता है ,लोग अपनी मन्नत करते है एवं जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है उसके बाद लोग यहां आकर प्रसादी करते है l
शिव पार्वती के विवाह स्थल का दूसरा प्रमाण
2. बड़ा तालाब
यह तालाब भी नगर के कुछ ही दूरी पर ग्राम कचनारिया रोड़ पर बाघा बल्डी के पास ही स्थित है , ऐसा माना जाता है कि जिस युग मे माता पार्वती ओर भगवान शिव का विवाह यहा हुआ था उस समय इनके विवाह में जो भोजन सामग्री बनाई गई होगी उसमे से एक सामग्री भात (चावल) को इसी तालाब में लाकर धोया गया था जिसका प्रमाण आज भी यह तालाब देता है ,आज भी इस तालाब के कुछ हिस्से का पानी जहा पर भात (चावल) धोए गए थे उतने हिस्से के पानी का कलर मटमैला चावल धुले हुवे पानी जैसा होता है ,ओर बाकी पूरे तालाब का पानी बिल्कुल साफ रहता है इससे यहा के लोगो का कहना है कि इस तालाब में भगवान शिव की बारात के भोजन की व्यवस्था के लिए बनने वाले चावल को धोया था जिससे आज भी इस पानी का रंग मटमैला है,ओर बाकी हिस्से का पानी साफ है ,हालांकि अभी वर्तमान में पिछले कुछ दिनों से कम वर्षा होने के कारण तालाब का पानी अत्यधिक सुख गया है ,लेकिन फिर बारिश में जब तालाब में पानी आता है तब उतने हिस्से जिसमे चावल धोए थे उसके पानी का रंग मटमैला ही रहता है l
शिव पार्वती के विवाह का तीसरा प्रमाण
3. देवरा बल्डी
नगर से कुछ ही दूरी पर बड़गांव रोड़ पर स्थित देवरा बल्डी है। जिसका नाम देवरा बल्डी इस लिए ही देवरा बल्डी है क्योंकि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह समारोह में जो देवता सम्मलित होने आए थे उनका निवास स्थान यही देवरा बल्डी ही बनाया गया था ,जितने भी देवता विवाह में आये उनको इसी देवरा बल्डी पर स्वागत के लिए रोका गया था ,इस देवरा बल्डी की एक ओर विशेषता है यहा दो प्राचीन कालीन स्तूप भी है जिन्हें छनिहारी एवं पणिहारी के नाम से जाना जाता है अभी कुछ वर्ष पहले से इन दोनों स्तुपो को पुरातत्व विभाग के अंतर्गत लेलिया गया था जिससे पुरातत्व विभाग द्वारा इन स्तुपो की मरम्मत करवाकर रंग रोगन भी करवाया गया ,यह दोनों स्तूप बल्डी के दोनों छोर पर स्थित है ,पुरातत्व विभाग द्वारा इनकी वाल बाउंड्री भी करवा दी गई है जिससे इनकी आभा बहुत ही सुंदर दिखाई देने लगी है ,नगर परिषद द्वारा देवरा बल्डी पर भी झूले लगा दिए गए थे जिससे देवरा बल्डी पर आने जाने वाले दार्शनिको द्वारा उपयोग लिया जाने लगा यहा भी लोग पिकनिक करने एवं घूमने फिरने आते है देवरा बल्डी के बीच मे एक तलाई है जिसमे साल के 8 महीने पानी रहता है जबकि देवरा बल्डी नगर से बहुत उचाई पर स्थित है जहाँ पानी रहना सामान्य बात नही है ,तलाई के पास में हनुमान जी महाराज का मंदिर है एवं एक संत का निवास भी है ,देवरा बल्डी के एक हिस्से पर पीर मालिक (हजरत दावल शाह वली)की दरगाह बनी हुई है जो मुस्लिम समुदाय के आस्था का केंद्र है यहाँ हर वर्ष मई महीने की 3 से 5 मई तक उर्स के मेला लगता है एवं दूर दराज के कव्वाल यहा अपनी कव्वाली हजरत दावल शाह वली की दरगाह पर पेश करते है l
शिव पार्वती के विवाह का चौथा प्रमाण
4. चोर बावड़ी
यह नगर के बस स्टैंड के पास पोलखेड़ा रोड़ पर स्थित है यह बाउड़ी भी बहुत ही प्राचीन है ऐसा मानना है कि इस बाउड़ी का निर्माण एक ही रात में किया गया था इस बाउड़ी में एक गहरा कुण्ड बना हुवा है एवं बाउड़ी के अन्दर कमरे बने हुवे है । पूरी बाउड़ी जमीन के अंदर बनाई गई है बाहर से सिर्फ बाउड़ी की 4 फ़ीट के लगभग ऊंची दीवार है जो बाउड़ी की बाउंड्री भी मानी जाती है । बारिश में जब बाउड़ी में पानी भर जाता है तब पानी बाउड़ी के द्वार से बाहर निकलता है जो बहुत ही सुंदर प्रतीत होता है ऐसा प्रतीत होता है जैसे बाउड़ी अपने मुह से पानी उगल रही हो । इस बाउड़ी में भी भगवान शिव और मातापर्वती की बारात के बारातियो को रोका गया था इस बाउड़ी में 3 तरफ रास्ते है जो सुरंग नुमा सीढ़ीदार बने हुवे है बाउड़ी में अंदर की आकृतियां आने आप मे खुद किसी युग में निर्मित होने का प्रमाण देती है । बाउड़ी के अंदर कमरों में निवास हो सके ऐसी व्यवस्था भी है लेकिन देख रेख के अभाव में यहा सब अस्त व्यस्त है और धीरे धीरे यह प्राचीनतम धरोवर नष्टता की ओर अग्रसर होती नजर आरही है l
शिव पार्वती के विवाह का पांचवा प्रमाण
5. भूतियाबे
यह स्थान पहले नगर से काफी दूरी पर था इस स्थान पर माता पार्वती ओर भगवान शिव के विवाह में जो भूत, प्रेत ,चुड़ैल,डाकिनी,पिशाचिनी आदि आए थे उन्हें इसी स्थान पर ठहराया गया था इसलिए इस स्थान को आज भी भूतियाबे के नाम से ही जाना जाता है । समय के साथ साथ इस स्थान पर लोगो का आवागमन बढ़ने लगा और वर्तमान में यहाँ लोगो की जरूरत को देखते हुवे शासन द्वारा बाँध का निर्माण करवा दिया गया जिससे पूरा नगर पानी पीता है इस बांध का नाम भी भूतियाबे बांध ही है इसी स्थान के पास चाँद बल्डा है जहाँ बहुत ही बड़ा परिसर है इस स्थान पर चाँद ,सूरज,नन्दी,श्रृंगी,आदि देवताओं को ठहराया गया था इस प्रकार नगर के चारो ओर भगवान शिव की बारात में आये हुवे बारातियो को ठहराया गया था यह सब किसी युग मे हुआ था इसलिए यहा के लोग आज भी माचलपुर को हिमाचल नगरी भी बोलते है। इस प्रकार के प्रमाण मात्र माचलपुर नगरी में ही देखने को मिलते है इसलिए माता पार्वती का मायका माचलपुर को ही माना जाता है l
इस प्रकार माचलपुर नगर बहुत ही प्राचीन नगर माना जाता है यहाँ बहुत प्राचीन मंदिर एवं शिवालय है जिसे गुप्तनाथ के नाम से जाना जाता है भगवान गुप्तनाथ को स्वयंभू भी कहा जाता है क्योंकि भगवान यहाँ स्वयं प्रकट हुवे थे । रावला परिवार जो यहाँ के जागीरदार थे उनकी जमीन में भगवान गुप्तनाथ स्वयंभू बनकर प्रकट हुवे, जिस स्थान पर भगवान का मन्दिर बना हुआ है एवं जहा गर्भ गृह है उस स्थान पर खेत था जिस पर जमींदार जी हल चला रहे थे लेकिन हल को एक पत्थर की शिला ने रोक दिया बहुत खुदाई करने पर भी पत्थर की गहराई नही आई ,उसके बाद भगवान स्वयंभू ने स्वयं जमींदार के सपने में आकर कहा कि में हु गुप्तनाथ ओर में स्वयंभू हु ,तब अगले दिन जमींदार ने उस स्थान को मंदिर के लिए छोड़ दिया और आज उस स्थान पर भगवान गुप्तनाथ का मन्दिर है ,जिनके दर्शन करने दूर दराज से लोग आते है और अपनी मनोकामना रखते है जिसे भगवान स्वयंभू हमेशा पूरी करते है यहा हर शिवरात्रि एवं श्रवण मास में हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते है । यहा होली की तेरस को भगवान स्वयंभू को पगड़ी बांधी जाती है जिसके दर्शन करने हजारो श्रद्धालु आते है लेकिन कुछ वर्षों से नगर में होली की पंचमी मनाने से यह प्रथा धीरे धीरे लोगो के द्वारा कम होती जा रही है । ऐसा भी मानना है कि हर शिवरात्रि को भगवान स्वयंभू गुप्तनाथ के ज्योतिर्लिंग का आकार एक तिल बराबर बढ़ता है । इस मन्दिर पर महामृत्युंजय जाप अनुष्ठान आदि चलते ही रहते है l
नगर के प्राचीन होने का नगर खुद देता है प्रमाण
नगर के प्राचीन होने का प्रमाण नगर के बहुत ही करीब बनी हुई केवड़ा बाउड़ी जो भगवान गुप्तनाथ जाने के रास्ते में भोलाराम मंदिर है वहाँ से केवड़ा बाउड़ी का रास्ता जाता है केवड़ा बाउड़ी बहुत ही प्राचीन है यह आधुनिक युग का स्विमिंग पूल है यहाँ भगवान नरसिंह का मंदिर है जो बैरागी परिवार का है यह केवड़ा बाउड़ी होलकर स्टेट में निर्मित मानी जाती है । केवड़ा बाउड़ी के निर्माण का उद्देश्य भगवान नरसिंह की पूजा हेतु जल लेने के लिए किया गया था लेकिन इसकी बनावट बिलकुल स्विमिंग पूल जैसी है यहा दो कुण्ड बने हुवे है जो अपने आप मे प्राचीन होने का प्रमाण देते है दोनों कुण्ड काफी बड़े है बारिश के मौसम में जब बड़ा कुण्ड पानी से भर जाता है तो उसका अवर फ्लो छोटे कुण्ड में बनाया गया है जिससे बड़े कुण्ड का पानी छोटे कुण्ड में आता रहता है यह बिल्कुल प्राकृतिक है दोनों कुण्ड पानी से लबालब भर जाते है दोनों कुण्ड को पत्थर से निर्मित किया गया था एवं विभिन्न प्रकार के प्राचीन चित्र कुण्ड में मूर्ति के रूप में बना कर लगा रखे है जो काफी प्राचीन होने का प्रमाण देते है । आधुनिक समय मे अर्थात वर्तमान में नगर में कोई स्विमिंग पूल न होने के कारण बैरागी परिवार ने दोनों कुण्डों को नगर के बच्चो को तैरना सीखने ले लिए स्वतंत्र रख रखे है । वर्तमान में नगर की 90 % जनता केवड़ा बाउड़ी में ही तैरना सीखती है । इस लिए ही नगर परिषद माचलपुर द्वारा केवड़ा बाउड़ी में अंदर फर्श का निर्माण एवं क्षतिग्रस्त कुण्ड का जीणोद्धार करवाया गया ताकि नगर की यह ऐतिहासिक प्राचीनतम धरोवर सुरक्षित रहे और भविष्य में भी नगर की भावी पीढ़ियों को तैरना सिखाती रहे l
इस प्रकार नगर में बहुत सारे प्राचीन इमारते एवं मंदिर है जो इस नगर को किसी युग मे माता पार्वती का मायका होने का प्रमाण देते है । नगर में सभी धर्मों के लोग निवास करते है । एवं यहा हर धर्म के लोग यह मानते है कि यह नगरी किसी युग मे माता पार्वती की नगरी रही है इस नगर में प्राचीन समय मे 52 ताल एवं तलैय्या थी जिसमे पानी का निर्गम एक से दूसरे में था पर नगर के आस पास चारो ओर पानी ही पानी था । नगर में वर्तमान समय मे इन धरोवरो की देखरेख इतनी नही हो पारही है कि यह अब किसी अगले युग तक चले,यह सब अब सिर्फ इतिहास में ही रह जाएगा वर्तमान में अगर इन सब धरोवर की देख रेख नही की गई तो इस नगर के पास जो माता पार्वती का मायका होने का जो प्रमाण है और यह प्राचीन नगरी है इसका भी प्रमाण नष्ट होता प्रतीत होरहा है । नगर के दोनों छोर पर स्थित बाघा बल्डी एवं देवरा बल्डी दोनो स्थानों पर वर्तमान समय मे शासन की अनदेखी बहुत नजर आरही है दोनों ऐतिहासिक बल्डी को लोगो द्वारा धीरे धीरे अवैध रूप से अतिक्रमण किया जा रहा है जिसे हटाने में किसी को कोई परवाह नही है क्या ये इस नगर का दुर्भाग्य है कि यह माता पार्वती एवं भगवान शिव के विवाह का प्रमाण स्थल है या ये बहुत ही प्राचीन नगरी है जो इस ऐतिहासिक बल्डीयो को धीरे धीरे खोद कर या अतिक्रमण कर नष्ट किया जा रहा है और अतिक्रमण एवं नष्ट करने वालो को शासन भी नजर अंदाज किये जा रहा है जबकि इन बल्डीयो पर आए दिन कोई न कोई कार्यक्रम होते ही रहते है और उन कायक्रमो में कई बार प्रशासनिक अमले के अधिकारी एवं कर्मचारी भी आते रहते है फिर भी इस ऐतिहासिक धरोवर को बचा नही पा रहे है l |
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Written by NAGESH KUMAR JOSHI
District: Hoshangabad
State: Madhya Pradesh